क्या पत्रकारों को फर्जी करार दे सकती है राज्य सरकार?

Reported by lokpal report

13 Aug 2020

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पब्लिक लोकपाल विशेष

बिहार में इन दिनों वेब पत्रकारों और राज्य सरकार के बीच एक अहम जंग चल रही है. राज्य सरकार चाहती है कि वेब पत्रकारों पर शिकंजा कसा जाये क्योंकि चुनाव का माहौल है और इन पत्रकारों पर कोई दबाव नहीं बनाया जा सकता क्योंकि वेब पोर्टल की पत्रकारिका एक असंगठित पत्रकारिता या व्यवसाय की तरह है. जहाँ प्रमुख अख़बारों की संख्या और मालिक सरकार को ज्ञात है, वहीं वेब पोर्टल इतने ज़्यादा हैं कि कोई सरकार इसको नियंत्रित नहीं कर सकती. साथ ही एक न्यूज़ पोर्टल कहीं से भी और कहीं तक पहुँच सकता है. बड़े व्यावसायिक संस्थान अगर इन्हें चलाते तो शायद सरकार इनसे कोई संवाद स्थापित कर नियंत्रित कर सकती थी लेकिन यहाँ संख्या इतनी ज़्यादा है कि स्थिति सरकार के नियंत्रण से बाहर हो गयी है. लेकिन राज्य सरकार को शायद यह पता होगा कि न्यूज़ पोर्टल को अवैध क़रार देना उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर की चीज़ है. हाँ, अगर कोई न्यूज़ पोर्टल सामाजिक शांति भंग करने या असहिष्णुता फैलाने का काम करता हो तो उसके स्वामी पर कार्रवाई कर सकती है राज्य सरकार. वेब पोर्टल और पत्रकारिता कितनी वैध है, एक नज़र-

आज जबकि टेक्नोलॉजी हल चलाने से लेकर अंतरिक्ष में छलांग मारने का एक जरिया बना हुआ है, उस दौर में पत्रकारिता भी इस तकनीकी क्रांति से अछूती नहीं रही है. कभी अपनी बात कहने और उसे प्रकाशित करवाने के लिए एक मध्यमवर्गीय पत्रकारों को प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दफ्तरों के आस-पास कदमताल करने पड़ते थे, फिर भी कई बार नाकाम हो जाते थे. ऐसे में पत्रकारों को अपने विचारों को, महत्वपूर्ण ख़बरों को व्यक्त करने का एक नया जरिया मिला जिसे हम और आप आज 'न्यूज़ पोर्टल' के नाम से जानते हैं. पत्रकारों के इस नए भरोसेमंद जरिये को आज 'फर्जी माध्यम' और न्यूज़ पोर्टल के पत्रकारों को उनके 'फर्जी' होने का आरोप झेलना पड़ रहा है. कई सरकारी अधिकारी भी इस बात पर मुहर लगा बैठते हैं कि न्यूज़ पोर्टल फर्जी होते हैं और उसमे काम करने वाले लोग असल में पत्रकार हैं ही नहीं. पत्रकारों की अभिव्यक्ति के इस आसान जरिये को मौन रखने के प्रयास  में तमाम जवाबदेह लोग यह भूल जाते हैं कि पत्रकारिता का इतिहास ऐसा है कि जितनी बार इसे दफ़न करने या रौंदने की कोशिश हुई यह उसके दोगुने वेग से वापस लौटा है और अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करवाई है. फिर चाहे बरतानिया हुकूमत में पत्रकारों को दबाने की कोशिश के तहत 1799 का प्रेस नियंत्रण अधिनियम हो, या गवर्नर जनरल जॉन एडम्स द्वारा 1823 में भारतीय प्रेस पर लगाया गया पूर्ण प्रतिबन्ध हो (इसी अधिनियम के कारण राजा राममोहन रॉय की पत्रिका मिरात उल अख़बार का प्रकाशन बंद हो गया था), या फिर 1878 का वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट हो, हिंदुस्तानी पत्रकारिता को दबाने का हर मुमकिन कोशिश की गई लेकिन वह कभी झुकी नहीं. 

वर्ष 1966 में भारतीय प्रेस परिषद का गठन किया गया जिससे भारत में प्रेस के मानकों को बनाये रखा जा सके और उसमे सुधार की स्वतंत्रता का संरक्षण हो. लेकिन भारत में आपातकाल ने फिर से भारतीय पत्रकारिता की आजादी पर ग्रहण लगा दिया जिससे तमाम समाचार पत्रों ने दम तोड़ दिया. सेवा के मकसद से जन्मी पत्रकारिता की बागडोर देश के बड़े पूंजीपतियों के हाथ आ गई, नतीजा सेवाभाव ने उद्योग का रूप ले लिया. फिर टीवी का युग आया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने दस्तक दी. शुरुआती उपेक्षाओं को दरकिनार करते हुए इसने प्रिंट मीडिया को मीलों पीछे छोड़ दिया. 

पूंजीपतियों के हाथ में पत्रकारिता की बागडोर ने तमाम बार उसके स्तर को धूमिल किया तब तक इंटरनेट का युग आ चुका था, जिससे वेब पोर्टल ने जन्म लिया और खबरों व स्थानीय सत्यता किसी भारी-भरकम मीडिया इंडस्ट्री की मोहताज नहीं रह गई. सूचना तकनीकी में आई इंटरनेट क्रांति की बदौलत अब न्यूज़ पोर्टल काफी हद तक सरकारी व कॉर्पोरेट दबाव की कठपुतली नहीं हैं. यही कारण है कि अब न्यूज़ पोर्टल और उनसे जुड़े पत्रकारों पर 'फर्जी व भ्रामक' ख़बरों को उड़ाने का वाहियात आरोप लगाया जा रहा है. असल में न्यूज़ पोर्टल के आने से भ्रष्ट सरकारी कर्मचारी व चाटुकार पत्रकारों की कमाई आहत हो रही है, इसी वजह से वह इस जन अभिव्यक्ति के साधन को निगलने का प्रयास कर रहे हैं. 

कई बार सरकारी अधिकारी यह फरमान जारी कर देते हैं कि सरकार न्यूज़ पोर्टल को फर्जी मानती है लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि सरकार की इस मान्यता का वह कोई लिखित प्रमाण नहीं दिखा पाते हैं. भारत में मीडिया के पास अपनी वैधता का एक ही अमोघ है और वह है भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 में दिए गए स्वतंत्रता के मूल अधिकार, जिसमे प्रेस को 19a में दर्ज 'विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' के समकक्ष माना गया है. तमाम विवादों के बाद अब सरकार न्यूज़ पोर्टल के लिए नियमावली लागू करने जा रही है. वर्ष 2018 के अप्रैल महीने में सूचना व प्रसारण मंत्रालय की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि ऑनलाइन मीडिया के पास अब तक टीवी चैनलों व अखबारों के समान प्रेस कौंसिल जैसी कोई संस्था नहीं है, जिसे देखते हुए एक नियामक ढांचा बनाने के लिए एक समिति का गठन किया जाएगा. दस सदस्यीय इस समिति में संयोजक सूचना और प्रसारण मंत्रालय के सचिव के अलावा प्रेस कॉउंसिल ऑफ़ इंडिया और एनबीए के सदस्य होंगे, साथ ही गृह मंत्रालय व कानून मंत्रालय के सचिव भी इस समिति में शामिल होंगे.

अब सवाल यह उठता है कि एक तरफ जहाँ केंद्र सरकार का सूचना व प्रसारण मंत्रालय दो साल पहले ऑनलाइन मीडिया की नियमावली बनाने के लिए समिति के गठन की घोषणा कर चुका है वहीं बिहार सरकार वेब पोर्टल को फर्जी किस आधार पर ठहरा रही है? चूँकि मीडिया का प्रबंधन व निबंधन की देखरेख सूचना व प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आता है फिर राज्य सरकार केंद्र सरकार के कार्यक्षेत्र में दखल क्यों देख रही है वह भी तब जब बिहार में सरकार केंद्र में सत्ताधारी भाजपा समर्थित है? ऑनलाइन मीडिया की वैधता मामले में बिहार सरकार व केंद्र सरकार में विरोधाभास क्यों है?

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