मिलिए ! इन "ठाकुरों" से जिनके "दम पर बनती है 'यूपी की "साझा सरकारें", तभी तो 'पब्लिक इन्हें कहती है 'सियासत का.....

Reported by Lokpal News

21 Feb 2017

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Ajayendra Rajan

उत्तर प्रदेश की राजनीति में क्षत्रिय वर्ग एक ऐसा वर्ग है, जिसे सत्ता पक्ष से तालमेल बिठाने में माहिर माना जाता है. संख्या बल के लिहाज भले ही ये महज 8 फीसदी ही हो लेकिन सामाजिक और आर्थिक समीकरण में बाहुबल और धनबल से संपन्न होने के कारण ये बिरादरी सियासत में ज्यादा दखल रखने में सफल रही है. इस बार के विधानसभा चुनावों में भी सबकी निगाहें इसी वर्ग पर टिकी हुई हैं.

उत्तर प्रदेश की राजनीति में खंडित जनादेश वाली सरकारों में समीकरण बनाने और बिगाड़ने की इनकी क्षमता प्रदेश कई बार देख चुका है. लेकिन ये वर्ग कभी एक वोट बैंक की तरह सामने नहीं आया.

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि सत्ता इनकी प्राथमिकता रही है, यही कारण है कि क्षत्रिय वोटरों का रुझान समय-समय पर बदलता रहा है. इस बार के चुनावों में सपा में वर्चस्व की जंग में कई क्षत्रिय चेहरों को नुकसान हुआ है, इसका फायदा भाजपा लेने की कोशिश में है.

2012 में समाजवादी पार्टी के पक्ष में बड़ा क्षत्रिय तबका गया था. उस समय इनके विधायकों की संख्या 56 थी.

उत्तर प्रदेश में वीर बहादुर सिंह और विश्वनाथ प्रताप सिंह के बाद आज राजनाथ सिंह प्रदेश के क्षत्रियों में सबसे बड़े नेता माने जाते हैं. कुछ समय तक अमर सिंह की भी क्षत्रिय समाज में अच्छी पकड़ मानी जाती थी लेकिन समय बीतने के साथ ही धीरे-धीरे ये पकड़ ढीली पड़ती चली गई.

कुंडा के निर्दलीय विधायक और कई सरकारों में मंत्री रह चुके राजा भैया की पकड़ भी क्षत्रियों में अच्छी मानी जाती है. इनकी सपा के साथ भाजपा से भी अच्छे रिश्ते रहे हैं.

पार्टियों में क्षत्रिय चेहरों की बात करें तो भाजपा से गृहमंत्री राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश में बड़े क्षत्रिय चेहरे माने जाते हैं. इनके अलावा केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री वीके सिंह, महंत आदित्यनाथ भी हैं. पूर्वांचल में गोरक्षपीठ क्षत्रियों की होने के नाते महंत आदित्यनाथ का इस इलाके में खासा प्रभाव रहा है.

वहीं पार्टी में कुछ क्षत्रिय चेहरे ऐसे भी हैं, जो तेजी से उभर रहे हैं, इनमें राष्ट्रीय सचिव महेंद्र सिंह, विधायक सुरेश राणा और संगीत सोम और प्रदेश महिला मोर्चा की अध्यक्ष स्वाति सिंह प्रमुख हैं.

कांग्रेस में संजय सिंह का नाम प्रमुख हैं. पूर्व सांसद रत्ना सिंह के अलावा इस बार अपनी बेटी का रायबरेली से चुनाव मैदान में उतारने वाले अखिलेश सिंह और एमएलसी दीपक सिंह का नाम भी प्रमुख है.

समाजवादी पार्टी के राजा अरिदमन सिंह के भाजपा जाने और अमर सिंह के पार्टी से दूर जाने के बाद राज्यसभा सांसद नीरज शेखर बड़ा नाम हो गए हैं. वहीं ओम प्रकाश सिंह, अरविंद सिंह गोप और यशवंत सिंह भी पार्टी के क्षत्रिय चेहरा बनते दिखाई दे रहे हैं.

वहीं बसपा में ठाकुर जयवीर सिंह को बड़ा नाम माना जाता है. इनके अलावा विधायक उमाशंकर सिंह और पूर्व विधायक जितेंद्र कुमार सिंह बबलू के नाम भी आते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में आमतौर पर क्षत्रिय वोटरों का रुझान समय-समय पर बदलता रहता है. 2002 में जरूर ये राजनाथ सिंह की अगुवाई में भाजपा ने क्षत्रिय समाज को अपनी तरफ आकर्षित किया. लेकिन उसके बाद इनका मोहभंग हुआ और अन्य पार्टियों में ये वोट बंटने लगा.

फिर रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया पर पोटा लगाए जाने के बाद से क्षत्रिय समाज बहुजन समाज पार्टी के खिलाफ होता चला गया. यही कारण था कि समाजवादी पार्टी को 2012 में क्षत्रिय समाज का अच्छा समर्थन मिला. हालांकि इस दौरान राजनाथ सिंह के कारण कुछ वोट भाजपा के साथ भी जुड़ा रहा, वहीं कांग्रेस के यूपी प्रभारी दिग्विजय सिंह के आने से इस वोट का रुझान थोड़ कांग्रेस की तरफ भी गया.

वह कहते हैं कि वर्तमान विधानसभा चुनाव की बात करें तो स्थिति ये है कि बसपा ने अभी तक इस वोट को आकर्षित करने के लिए कुछ खास प्रयास नहीं किए हैं. वहीं समाजवादी पार्टी में अरिदमन सिंह, आनंद सिंह, योगेश प्रताप सिंह आदि को हटाए जाने से क्षत्रिय समाज नाराज दिख रहा है.

भाजपा ने क्षत्रिय समाज को लेकर काफी बेहतर रणनीति बनाई है. उसके योगी आदित्यनाथ चूंकि अकेली क्षत्रिय पीठ के मठाधीश हैं, लिहाजा उनका असर इस समाज पर पड़ता है. वहीं राजनाथ सिंह का भी प्रभाव है.

अपने चुनाव अभियान में भाजपा ने क्षत्रिय नेताओं को बेहतर ढंग से पेश कर वोट बैंक पर असर डालने की कोशिश की है, लिहाजा भाजपा को इसका फायदा हो सकता है. हालांकि प्रदेश में कई सीटें ऐसी भी हैं, जहां पार्टी नहीं प्रत्याशी देखकर ये समाज वोट करता है.

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