हिंदी पत्रकारिता के शलाका पुरुष पंडित हरि शंकर द्विवेदी

Reported by lokpal report

17 Sep 2020

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जन्मदिन पर विशेष:

मंगल पांडेय, चित्तू पांडेय जैसे वीर सपूतों की कर्मस्थली रही बलिया कई ऐसे व्यक्तित्वों की जन्मस्थली रही जिसने इस धरती का गुणगान अपने कर्मों, कर्तव्यों एवं विचारों से विश्वपटल पर रखा। ऐसे ही व्यक्तित्व जिसने पत्रकारिता में एक नई विचारधारा एवं सोच को जन्म दिया, उनका नाम है -हरिशंकर द्विवेदी। 

पं० हरिशंकर द्विवेदी का जन्म बलिया जिले के चांदपुर गाँव (तहसील बैरिया) में 17 सितम्बर, 1922 को हुआ था। पं० हरिशंकर द्विवेदी चार भाइयों एवं एक बहन में सबसे ज्येष्ठ थे। पिता डॉ० हरिहरनाथ द्विवेदी थे तो चिकित्सक, साथ ही उनकी प्रतिष्ठा चिकित्सक, सलाहकार एवं गुरु के रूप में थी। उनकी हिन्दी और अंग्रेजी के साथ-साथ समसामयिक विषयों एवं देश में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन की प्रबुद्ध जानकारी के कारण ही सुबह और शाम उनके द्वार पर गाँव एवं आस-पास के समस्त क्षेत्रों से आये लोगों से विभिन्न विषयों पर नियमित चर्चा होती थी।

ऐसे माहौल में जन्मे और प्रारंभिक पालन पोषण के बीच बालक पंडित हरिशंकर द्विवेदी पर इस परिवेश का गहरा प्रभाव पड़ा। पं० हरिशंकर द्विवेदी का झुकाव हिन्दी लेखन, पठन और व्याख्या की तरफ होना शुरू हो गया। परिणामस्वरूप कलकत्ता में मैट्रिक की पढ़ाई के दौरान ही उनके लेख कलकत्ता के प्रसिद्ध समाचार पत्रों में छपने लगे थे।

महज 23 वर्ष की आयु में उन्होंने कलकत्ता के 'दैनिक विश्वबन्धु' के समाचार सम्पादक नियुक्त होने का गौरव हासिल किया। 

हिन्दी के कवि एवं पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल पंडित विष्णुकांत शास्त्री जी जिस तरह से भाव-विभोर होकर उन्हें नमस्कार करते थे, इससे पता चलता था कि हिन्दी का यह रत्न, हिन्दी के प्रखर पंडितों के बीच क्या स्थान रखते थे। प्रचार से हमेशा स्वयं को दूर रखने वाले इस शख्सियत को समझ पाना ग्रन्थ के समस्त पन्नों, छंदों को पूरी तरह से समझने जैसा है। 

हिंदी पत्रकारिता के इस पुरोधा के बृहद जीवन को शब्दों मे पिरोने की कोशिश की जा रही है ताकि उनकी जीवनी आज के पत्रकारों के लिए एवं  प्रबुद्ध पाठकों के सामने रखी जा सके। इनके जीवन वृतान्त के विभिन्न पहलुओं को छूने की कोशिश के तौर पर एक संस्मरण बहुत जल्दी प्रकाशित की जाएगी । उत्तर प्रदेश में जन्मे इस शलाकापुरुष को श्रद्धांजलि सही तौर पर यही होगी कि हम पत्रकारिता के उनके आदर्शों को आज के परिवेश में अंगीकृत करें।

(पंडितजी हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र मे जहाँ 'सन्मार्ग' के संस्थापक सम्पादक रहे वहीं नवभारत टाइम्स के कलकत्ता,बांबे,दिल्ली संस्करण के एक के बाद एक सम्पादक हुए। जीवन के अंतिम दिनों मे बिहार से निकलने वाले समाचार पत्रों 'आर्यावर्त' एवं अंग्रेज़ी के दैनिक, 'द इंडियन नेशन' के प्रबंध संपादक एवं प्रबंध निदेशक रहे। डालमिया समूह के संस्थापक राम कृष्ण डालमिया एवं उनके कनिष्ठ जय दयालजी पर पंडितजी द्वारा लिखा संस्मरण ग्रंथ इतना अद्भुत है कि पढ़ते समय ऐसा लगता है मानो इन डालमिया भाईयों की जीवनी आँखों के सामने दिख रही हो। पंडितजी जैसे व्यक्तित्व की परछाईं मात्र होकर भी हिन्दी पत्रकारिता की ढलान को रोकने जैसी सेवा की जा सकती है। ऐसे हिन्दी के पुरोधा को शत् शत् नमन !)

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