4 वर्षों में बढ़ा शिंशु लिंगानुपात, 1000 पर लिंगानुपात 923 से बढ़कर हुआ 931

Reported by lokpal report

23 Jun 2019

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नई दिल्ली : जन्म के समय अखिल भारतीय लिंगानुपात (एसआरबी) 2015-16 के बाद से आठ अंकों की वृद्धि के साथ प्रति 1,000 लड़कों पर बढ़कर 931 हो गई है। इस साल मार्च तक केरल और छत्तीसगढ़ में 959 के सर्वोच्च लिंगानुपात के साथ शीर्ष पर है, इसके बाद मिजोरम (958) के करीब है। गोवा (954) तीसरे स्थान पर है। सूची में सबसे नीचे दमन और दीव (889), लक्षद्वीप (891) और पंजाब (900) हैं। लिंगानुपात प्रति 1,000 लड़कों पर लड़कियों की संख्या के रूप में व्यक्त किया जाता है।

2015-16 में अखिल भारतीय लिंगानुपात दर 1000 पुरुषों पर 923, 2016-17 में 926 और 2017-18 में 929 रहा। सरकार की प्रमुख योजना “बेटी बचाओ, बेटी पढाओ” के बारे में लोकसभा में उठे एक सवाल के जवाब में महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा दिया गया।

2017-18 से 21 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में जहां लिंगानुपात दरमें वृद्धि हुई है, वहां सबसे अधिक 51 अंकों की वृद्धि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में हुई है जहाँ पर यह दर 897 से 948 पहुँच गई है। उसके बाद सिक्किम (928 से 948) और तेलंगाना (925 से 943) का नंबर आता है। 2017-18 की तुलना में 12 राज्यों में गिरावट भी दर्ज की गई। 42 अंकों की सबसे बड़ी गिरावट अरुणाचल प्रदेश (956 लड़कियों से 914 तक) में देखी गई थी।

अरुणाचल के बाद जम्मू-कश्मीर (958 लड़कियां 943 लड़कियां), तमिलनाडु (947 लड़कियों से 936 लड़कियां) और महाराष्ट्र (940 लड़कियों से 930 लड़कियां) का नंबर आता है।

छत्तीसगढ़, जिसका जन्म लिंगानुपात (SRB) 2018-19 में केरल के साथ सबसे अधिक है, वहां वास्तव में 2017-18 में 961 से गिरावट दर्ज की गई। केरल में भी 2017-18 में 964 की तुलना में इस साल गिरावट देखी गई है।

2015-16 से 2018-19 के बीच 25 राज्यों में शिशु लिंगानुपात दर सबसे अधिक नोट की गई। इन राज्यों में लक्षद्वीप (832 से 891 यानी 59 प्वाइंट), अंडमान व निकोबार द्वीपसमूह (890 से 948 यानी 58 प्वाइंट) गोवा (918 से 954 यानी 36 प्वाइंट), नागालैंड (904 से 936 यानी 32 प्वाइंट) और उत्तराखंड (906 से 938 यानी 32 प्वाइंट) शामिल हैं। हरियाणा जहाँ पर बीजेपी सरकार ने जनवरी में 2015 में बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना की शुरुआत की थी, वर्ष 2016 में शिशु लिंगानुपात दर 887 दर्ज की गई थी। वर्ष 2017-18 व 2018-19 में इस आंकड़े में सुधार होकर 1,000 लड़कों पर 914 लड़कियां हो गईं।

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